السبت، 15 أغسطس 2009

हम रमज़ान का स्वागत कैसे करें और उस से कैसे लाभान्वित हों?

मैं अति मेहरबान और दयालु अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ।

हम रमज़ान का स्वागत कैसे करें और उस से कैसे लाभान्वित हों?

हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है जिसने हमें रमज़ान जैसा शुभ अवसर प्रदान किया, तथा सदैव अल्लाह की कृपा व शान्ति अवतरित हो अन्तिम पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर जिन्हों ने सर्वश्रेष्ठ ढंग से रमज़ान का रोज़ा रखा और क़ियामुल्लैल किया।

इस्लामी भाईयो ! हम में से बहुत से लोग समय के बीतने और वर्ष के पूरा होने पर बहुत प्रसन्न होते हैं और अत्यन्त हर्ष व उल्लास का प्रदर्शन करते हैं, किन्तु इन बेचारों को मालूम नहीं (अथवा एहसास नहीं) कि एक दिन के बीतने से उनके जीवन का एक दिन कम हो जाता है और वो अपनी मृत्यु से एक दिन और निकट हो जाते हैं। कहने वाले ने कितना ठीक कहा है:

मनुष्य रात-दिन के बीतने पर बहुत प्रसन्न होता है, जबकि वास्तव में उन (रात-दिन) का समाप्त होना, स्वयं उस (मनुष्य) की समाप्ति है।

अत: मनुष्य को चाहिए कि उसे इस बात का गहरा एहसास हो और उसे जीवन का एक पल भी व्यर्थ में नष्ट नहीं करना चाहिए। विशेष कर नेकियों और भलाईयों के ऋतु और शुभ अवसर का व्यापक लाभ उठाना चाहिए। ताकि भूतकाल में जो कमी रह गई है उसकी आपूर्ति हो सके, तथा भविष्य के लिए कोष एकत्र हो।

अल्लाह तआला की इस समुदाय पर महान कृपा है कि उस ने हमें अनेक ऐसे अवसर प्रदान किए हैं जिन से लाभान्वित हो कर हम अल्लाह की क्षमा, दया, उपहार और उसकी निकटता के पात्र बन सकते हैं। उन्हीं में से एक महान और शुभ अवसर रमज़ान का महीना है।

इस्लामी भाईयो! शीघ्र ही हमारे ऊपर रमज़ान के महीने का चाँद उगने वाला है। क्या आप जानते हैं कि रमज़ान का महीना क्या है?

•- अल्लाह तआला ने जब से आकाश और धरती की रचना की है, उसके निकट महीनों की संख्या 12 (बारह) है और उन में से नववाँ (9) महीना रमज़ान का है।

•- रमज़ान ही का वह महीना है जिस में अल्लाह तआला ने सर्व संसार के मार्गदर्शन के लिए अपनी अन्तिम पुस्तक कुर्आन मजीद को अपने अन्तिम सन्देष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अवतरित करने का आरंभ किया।

•- रमज़ान ही का वह महीना है जिस में अल्लाह तआला ने संसार वालों पर दया करते हुए अपने खलील (मित्र), दूत और अन्तिम सन्देष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को सर्व संसार के लिए एकमात्र संदेश्वाहक और पथ प्रदर्शक के रूप में नियुक्त किया।

•- रमज़ान का ही वह महीना है जिस की पहली रात ही से स्वर्ग के द्वार खोल दिए जाते हैं, नरक के द्वार बन्द कर दिए जाते हैं और शैतान जकड़ दिए जाते हैं।

•- रमज़ान ही वह महीना है जिस में अल्लाह तआला ने दोषियों और पापियों के लिए प्रायश्चित का बढ़िया अवसर प्रदान किया है।

•- रमज़ान ही वह महीना है जिस में अल्लाह तआला ने उम्रा करने को हज्ज के समान घोषित किया है, और केवल यही नहीं बल्कि इसे पैग़म्गर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के संग हज्ज करने के समान बताया है।

•- रमज़ान ही वह महीना है जिस में अल्लाह तआला ने एक रात ऐसी रखी है जिस में इबादत करना हज़ार महीने (अर्थात: 83.33 वर्ष) की इबादत से बेहतर है।

•- रमज़ान ही वह महीना है जिसे अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़सम खाकर मुसलमानों के लिए सब से श्रेष्ठ और मुनाफिक़ों के लिए सब से बुरा महीना घोषित किया है।

सारांश यह कि रमज़ान का महीना भलाईयों, नेकियों, बरकतों, रहमतों, दुआओं की क़बूलियत, अज्र व सवाब में अधिकता, मग्फिरत, जहन्नम से आज़ादी... का महीना है। किन्तु प्रश्न यह है कि इस महीने का किस प्रकार स्वागत किया जाए? यह आदरणीय अतिथि जिस का 11 महीने की प्रतीक्षा के बाद हमारे आँगन में आगमन हुआ है, इस के साथ हमारा कैसा व्यवहार होना चाहि?

यह एक निराशाजनक वास्तविकता है कि हम ने इस अतिथि के साथ सदैव दुर्व्यवहार किया है। हर वर्ष यह मेहमान ऐसे अनेक उपहार ले कर आता है जिनकी प्रत्येक मनुष्य और विशेष कर मुसलमानों को कड़ी आवश्यकता होती है। किन्तु कितने ऐसे मुसलमान हैं जो उसके समस्त उपहारों को स्वीकार भी नहीं करते, जो मन में आया ले लिया और शेष को ठुकरा दिया।

क्या आप जानते हैं कि हमारे पूर्वज का इस महीने के साथ कैसा व्यवहार होता था? वो लोग इस महीने को पाने के लिए छ: महीना तक अल्लाह तआला से दुआ करते थे। जब यह महीना पा जाते तो उचित ढंग से इसका स्वागत करते। और जब यह महीना उन से प्रस्थान कर जाता तो छ: महीना तक अल्लाह तआला से ये दुआ करते कि उन्हों ने इस महीने में जो नेकियाँ की हैं उन्हें क़बूल करे ... आप ने देखा हमारे असलाफ का क्या हाल था .... और हमारा हाल क्या हो गया है। अल्लाह से दुआ है कि हमारे हालात में सुधार पैदा करे।

मुसलमानों को चाहिए कि नेकियों के अवसर से लाभान्वित होने में कोताही और लापरवाही से काम न लें। बल्कि उत्साह और प्रतियोगिता की भावना के साथ इस से अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिए। हमें रमज़ान जैसे महान और शुभ महीना का स्वागत:

1. शुद्ध और सच्ची तौबा के साथ करना खहिए, पिछले गुनाहों, दोषों और बुराईयों को तुरन्त त्याग कर उन पर लज्जित होना चाहिए, भविष्य में उनकी ओर पुन: न लौटने का दृढ़ संकल्प करना चाहिए और अत्याचार से तौबा कर के लोगों के हुक़ूक़ उन्हें लौटा देना चाहिए। उदाहरण के तौर पर यदि आदमी नमाज़ नहीं पढ़ता था, तो उसे नमाज़ की पाबन्दी करने का संकल्प करना चाहिए, या ज़कात और रोज़ा में कोताही करता था तो पुन: ऐसा न करने का दृढ़ संकल्प करना चाहिए, या इसी तरह अगर सूदी कारोबार करता था, तो तुरन्त उस से छुटकारा प्राप्त करके पुन: उस से दूर रहने का पक्का संकल्प करना चाहिए। इसी प्रकार यदि दूसरों के हुक़ूक़ को हड़प कर रखा है, तो उस से छुटकारा हासिल कर लेना चाहिए ...

2. ईमान, शान्ति और स्वास्थ्य की अवस्था में इस महीने को पाना, अल्लाह तआला का बहुत बड़ा उपकार और उपहार है। अत: इस पर अल्लाह की प्रशंसा और गुण-गान करनी चाहिए। जबकि कल आप के साथ कितने ऐसे लोग थे जो इस महीने को पाने की आशा रखते थे, किन्तु इस के आने से पहले क़ब्र की तारीकियों में चले गए।

3. हमें रमज़ान के आगमन पर प्रसन्न होना चाहिए, जैसाकि हमारे पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने साथियों (सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम) को रमज़ान के आगमन की शुभ सूचना देते और इस महीने की विशेषता और महत्ता से अवगत कराते थे। इसी प्रकार हमारे अस्लाफ (पूर्वज) इस महीने के आगमन पर हर्षित होते थे और इसे विशेष महत्त्व देते थे। इसलिए ऐसा नहीं होना चाहिए कि हम इस महीने के आगमन को बोझ समझें और अपने दिल में इस के प्रति घुटन महसूस करें।

4. हमें शुरू रमज़ान ही से पूरे महीने का रोज़ा रखने का दृढ़ संकल्प करना चाहिए, (जिस का एक लाभ यह होगा कि यदि रमज़ान पूरा होने से पूर्व मृत्यु हो जाती है तो हमें नीयत के कारणवश पूरे महीने का सवाब मिलेगा।) और इस महीने की घड़ियों और क्षणों से अधिकाधिक लाभान्वित होने के लिए पूर्व योजना बनाना चाहिए।

5. रमज़ान के फज़ाइल व बरकात के बारे में जानकारी प्राप्त करके अपने तन, मन और आत्मा को इस महीने से लाभान्वित होने के लिए तैयार करना चाहिये, ताकि हम पिछले सालों से बेहतर रूप में इस महीने को बिताएं। तथा हमारे मन में यह आशय होना चाहिए कि हो सकता है यह हमारा अन्ति रमज़ान हो! यदि हम ने इस से भर पूर लाभ नहीं उठाया तो हमें पछतावे के सिवाय कुछ हाथ नहीं आए गा।

6. रमज़ान के रोज़े के अह्काम व मसाइल की शुद्ध और सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करना चाहिये। क्योंकि मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह अल्लाह तआला की उपासना ज्ञान और समझ-बूझ के आधार पर करे। अल्लाह तआला ने बन्दों पर जो अह्काम अनिवार्य किए हैं उन के विषय में अज्ञानता का बहाना मान्य नहीं है। इसलिए रोज़ा से संबंधित अहकाम की पर्याप्त जानकारी प्राप्त करें, ताकि आप का रोज़ा अल्लाह के यहाँ स्वीकृत (मक़्बूल) और मान्य हो।

7. अल्लाह तआला ने जिस उद्देश्य के लिए रोज़े को अनिवार्य किया है, उसकी प्राप्ति अत्यन्त आवश्यक है। इसलिए हमें अपने रोज़े की उन चीज़ो से सुरक्षा करनी चाहिए जो उसके अज्र व सवाब को नष्ट कर देने वाली हैं। वर्ना यदि आप का रोज़ा रद्द कर दिया जाए, तो आप के भूखे-प्यासे रहने और कामवासना से बचाव करने का क्या लाभ ? यदि आप का क़ियामुल्लैल (तरावीह) आप के मुँह पर मार दिया जाए, तो आप के रूकूअ व सज्दे और अपने आप को थकाने का क्या फायदा ? जबकि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन है कि: ``बहुत से रोज़ेदार ऐसे हैं जिन्हें उनके रोजे़ से केवल भूख प्राप्त होता है, और बहुत से क़ियामुल्लैल करने वालों को उनके क़ियाम से केवल रतजगाई प्राप्त होती है।´´ (हाकिम, नसाई, अहमद) तथा सहीह बुखारी में है कि: ``जो व्यक्ति झूठ बात कहना, झूठ पर अमल करना और मूर्खता को त्याग न करे तो अल्लाह तआला को इस बात की कोई आवश्यकता नहीं है कि वह अपना खाना पानी बन्द कर दे।´´ इसलिए रोज़ेदार को चाहिए कि अपनी आँख, कान, ज़ुबान, दिल और शरीर के अन्य अंगों को अल्लाह की अवज्ञा और हराम चीज़ों से सुरक्षित रखे, केवल खान-पान और कामवासना से रूकने से रोज़े का उद्देश्य (अर्थात अल्लाह तआला का तक्वा और संयम) प्राप्त नहीं हो सकता।

8. हम अपने रोज़े के दिनों को अन्य दिनों के समान न बनाएं। ऐसा न हो कि हम रोज़ा खोलने के बाद खेल-कूद, गप-शप और निरर्थक बातों में लिप्त हो जाएं। खेल-कूद के लिए पूरा वर्ष है, लेकिन रमज़ान की अमूल्य घड़ियाँ यदि हम ने व्यर्थ में नष्ट कर दीं तो हम से बड़ा बद्-नसीब, अभागा और निकम्मा कोई नहीं। जो आदमी रमज़ान में अल्लाह की रहमत का पात्र बन गया वही वास्तव में मर्हूम (जिस पर दया की गई हो) है, और जो इस महीने में अल्लाह की रहमत से वंचित रह गया वह वास्तव में मह्रूम है। जो इस महीने में परलोक के लिए तोशा न एकत्र कर सके, वह मलामत के योग्य है। और ऐसे ही आदमी के बारे में फरिश्तों के सरदार जिब्रील अलैहिस्सलाम ने दया के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा कि: ``जो आदमी रमज़ान को पाए और अपने आप को अल्लाह की मग़्फिरत का पात्र न बना सके, तो ऐसे आदमी को अल्लाह अपनी रहमत से वंचित करे´´ आप इस पर आमीन कहिए। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस पर आमीन कही। इसलिए आवश्यक है कि हम इस महीने का पूरा लाभ उठाएं, इसे साल के अन्य महीनों के समान ही न बिता दें। तथा इस महीने का वास्तविक प्रभाव हमारे आचरण, लोगों के साथ हमारे व्यवहार और रहन-सहन पर अवश्य रूप से प्रतीक होना चाहिए।

संछिप्त यह कि रमज़ान के महीने की महत्ता और उसकी विशेषताओं उदाहरणत: जन्नत के द्वार का खोल दिया जाना, जहन्नम के द्वार का बन्द कर दिया जाना, शैतानों का जकड़ दिया जाना, गुनाहों की माफी, जहन्नम से आज़ादी, फरिश्तों का रोज़ेदार के लिए मग़्फिरत की दुआ करना, रोज़े का असीम अज्र व सवाब, रोज़ेदार के मुँह की बू का अल्लाह के निकट कस्तूरी से अधिक पसन्दीदा होना, शबे-क़द्र और उसका हज़ार महीनों से बेहतर होना... इन सभी तत्वों को अपनी दृष्टि के सामने रखें, तो आप के दिल में रमज़ान के महीने के प्रति उत्साह और शौक पैदा होगा और आप श्रद्धा पूर्वक इस महीने से लाभान्वित होने की चेष्टा कर सकें गे।

अल्लाह तआला से प्रार्थना है कि हमें इस महीने के सियाम व क़ियाम (रोज़े रखने और तरावीह पढ़ने) पर हमारी मदद करे, और इस से भर-पूर लाभ उठाने की तौफीक़ प्रदान करे। नि:सन्देह वही इस पर सहायक है। (लेखः अताउर्रहमान ज़ियाउल्लाह)

الأربعاء، 29 يوليو 2009

शाबान के महीने के अह्काम

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शाबान के महीने के अह्काम

हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए योग्य है जिस ने हमें इस्लाम की नेमत से सम्मानित किया और उसे अपने अन्तिम ईशदूत व सन्देष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर संपन्न कर के हमारे लिए एक मात्र धर्म के रूप में स्वीकार कर लिया। तथा अल्लाह की कृपा व शान्ति अवतरित हो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर जिन्हों ने धर्म के प्रसार व प्रदर्शन का कर्तव्य उम्मत की खैरख्वाही व सदुपदेश के साथ उचित ढंग से निभाया, और उम्मत को एक ऐसे रोशन मार्ग पर छोड़ कर गए जिस से वही आदमी भटके गा जो वास्तव में अभागा ही होगा।

इस्लामी भाईयो ! इन दिनों हम जिस शुभ महीने की छत्र-छाया में साँस ले रहे हैं, वह शाबान का महीना है। इस्लाम धर्म में इस महीने का क्या महत्व व विशेषता है? इस की बाबत सहीह हदीसों में क्य विर्णत हुआ है और पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस महीने में विशिष्ट रूप से क्या कार्य करते थे? इसके विपरीत आज साधारण मुसलमान क्या कार्य कर रहे हैं? इन पर सार रूप से प्रकाश डालना उचित होगा।

अल्लाह की कृपा से अगली पंक्तियों में उन बातों की धार्मिक वास्तविकता का उल्लेख किया जा रहा है जिन्हें संसार के बहुत से मुसलमान शाबान के महीने में नेकी और धर्म का काम समझ कर करते हैं।

1. शाबान के महीने में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क्या करते थे? :

आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है वह कहती हैं कि: ``मैं ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को रमज़ान के अतिरिक्त किसी अन्य महीने का सम्पूर्ण रोज़ा रखते हुए नहीं देखा, तथा मैं ने आप को शाबान से अधिक किसी अन्य महीने का रोज़ा रखते हुए नहीं देखा।´´ (बुखारी एंव मुस्लिम)

सुनन् नसाई और त्रिमिज़ी की एक रिवायत में है कि उन्हों ने कहा कि ``मैं ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को शाबान से अधिक किसी और महीने का रोज़ा रखते हुए नहीं देखा, आप थोड़े दिनों को छोड़ कर पूरे महीने का रोज़ा रखते थे, बल्कि आप पूरे महीने का रोज़ रखते थे।´´

इस हदीस से पता चला कि शाबान के महीने में अधिक से अधिक नफ्ली रोज़ा रखना मस्नून है।

पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस महीने में अधिक से अधिक रोज़ा क्यों रखते थे? इसका संकेत उसामा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से मिलता है। वह कहते हैं कि मैं ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा: आप जितना शाबान में रोज़ा रखते हैं, उतना मैं ने आप को किसी अन्य महीने में रोज़ा रखते हुए नहीं देखा? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: ``यह ऐसा महीना है जिस से लोग गफलत के शिकार हैं, जो रजब और रमज़ान के बीच पड़ता है। तथा यह ऐसा महीना है जिस में अल्लाह रब्बुल-आलमीन के पास आमाल पेश किए जाते हैं, इसलिए मेरी इच्छा है कि मेरे आमाल मेरे रोज़े की हालत में पेश किए जाएं।´´ (नसाई, इसे अललामा अल्बानी ने हसन कहा है)

इस हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शाबान के महीने में बाहुल्य रूप से रोज़ा रखने के दो कारण बतलाए हैं :

(क) इस महीने में लोग गफलत के शिकार रहते हैं, और लोगों के अल्लाह की इताअत और उपासना में गफलत करने के समय, अल्लाह की इताअत करना अधिक महत्व पूर्ण हो जाता है।

(ख) इस महीने में अल्लाह के पास लोगों के आमाल पेश किए जाते हैं, और रोज़ा उन आमाल में से है जो अल्लाह को बहुत पसन्दीदा है और उस में अल्लाह के लिए नम्रता व इख्लास पाया जाता है, इस लिए आप ने चाहा कि आप के आमाल रोज़े की हालत में पेश किए जाएं।

2. पन्द्रहवीं शाबान की रात के बारे में विर्णत हदीसें :

शाबान के महीने की पन्द्रहवीं रात के बारे में अनेक हदीसें आई हैं, लेकिन वो सब या तो ज़ईफ हैं या मौज़ूअ़ (मनगढ़त), जो प्रमाण नहीं बन सकतीं। केवल एक हदीस ऐसी है जिसे कुछेक मुहद्दिसीन ने हसन कहा है, जबकि अधिकांश ने उसे ज़ईफ कहा है। उस हदीस का अर्थ यह है कि पन्द्रहवीं शाबान की रात को अल्लाह तआला अपने बन्दों पर मुत्तला हो कर (झांक कर), मुश्रिक और कीना कपट (द्वेष) रखने वाले को छोड़ कर अपने सभी बन्दों को बख्श देता है।

किन्त यदि इस हदीस को सहीह मान लिए जाए, तब भी इस में 15 शाबान की रात को कोई विशिष्ट कार्य करने का कोई तर्क नहीं है।

इसके अतिरिक्त 15 शाबान की रात की फज़ीलत या उस में कोई विशिष्ट कार्य (इबादत) करने के बारे में जो भी हदीसें बयान की जाती हैं, वो सब की सब या तो ज़ईफ या गढ़ी हुई हैं। अत: उस रात कोई विशिष्ट अमल करना अनाधार और अवैद्ध होगा, और पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथन के अनुसार बिद्अत कहलाए गा। तथा आख़िरत में ऐसा अमल स्वीकार नहीं होगा। इसलिए हर मुसलमान को ऐसे कामों से अति दूर रहना चाहिए।

3. शाबान में प्रचलित बिद्आत:

जैसाकि उल्लेख किया गया कि शाबान के महीने में विशिष्ट रूप से पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से केवल इतना प्रमाणित है कि आप इस महीने में अधिक से अधिक नफ्ली रोज़ा रखते थे, और इसके लिए किसी दिन को सुनिश्चित नहीं करते थे। किन्तु आजकल बहुत सारे मुसलमान पन्द्रहवीं शाबान की रात और उसके दिन को बहुत महत्व और विशेषता व प्राथमिकता देते हुए ऐसे अधार्मिक कार्य करते हैं जिन का हमारे पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की लाई हुई शरीअत से कोई संबंध नहीं है। बल्कि वो बिदआत की सूची में आते हैं जिन से इस्लाम ने सख्ती से रोका है। इस महीने में प्रचलित बिद्आत और अधार्मिक कार्य का संछिप्त उल्लेख किया जा रहा है ताकि मुसलमान इन से दूर रहें।

1. पन्द्रहवीं शाबान की रात को जश्न मनाना।

2. पन्द्रहवीं शाबान की रात को `सौ रक्अतें´ बराअत की नमाज़ (हज़ारी नमाज़) पढ़ना, जिस में हर रक्अत में दस बार सूरतुल-इख्लास पढ़ना और हर दो रक्अत पर सलाम फेरना। ज्ञात होना चाहिए कि पन्द्रवीं शाबान की रात को नमाज़ पढ़ने की बिद्अत का आरम्भ 448 हि0 में बैतुल-मक़्दिस में `इब्ने अबिल हम्रा´ नामी आदमी के द्वारा हुआ। इस से पूर्व इसका कोई अस्तित्व ही नहीं था। (गौर करें ! फिर यह कैसे वैद्ध हो सकता है? )

3. पन्द्रहवीं शाबान की रात को औरतों का बन-ठन कर क़ब्रिस्तान जाना, वहाँ क़ब्रों पर चिरागाँ करना, अगरबत्ती जलाना, फूल चढ़ाना, मुर्दों के सामने अपनी मुरादें रखना और अपना दुखड़ा सुनाना...इत्यादि।

4. घरों, सड़कों, क़ब्रों, मिस्जदों में रोशनी करना, जो कि मजूसियों की ईजाद की हुई चीज़ है, जो आग को अपना परमेश्वर मानते हैं।

5. मुसीबत व बला टालने, लम्बी उम्र और लोगों से बेनियाज़ी के लिए छ: रक्अत नमाज़ पढ़ना।

6. पन्द्रहवीं शाबान को हल्वा बनाना (शुब्रात का हल्वा), इसके पीछे जो आस्था पाया जाता है वह अनाधार और एकमात्र अफ्साना है।

7. इस रात रूहों के आगमन का अक़ीदा रखना, और यह गुमान करना कि इस रात मरे हुए लोगों की रूहें घरों में आती हैं और रात भर बसेरा करती हैं, अगर घर में हल्वा पाती हैं तो खुश हो कर लौटती हैं वर्ना मायूस हो कर लौटती हैं। इसलिए उनके मन पसन्द खाने तैयार किए जाते हैं।

8. रूह मिलाने का खत्म दिलाना। जिसके पीछे यह आस्था कार्य कर रहा है कि जो लोग शुब्रात से पहले मर जाते हैं उनकी रूहें भटकती रहती हैं, रूहों से नहीं मिलती हैं, फिर जब शबे बराअत (पन्द्रहवीं शाबान की रात) आती है तो रूहों को रूहों से मिलाने का खत्म दिलाया जाता है। नि:सन्देह इस्लामी अक़ीदा के साथ यह स्पष्ट परहास है!

यह और इनके अतिरिक्त अल्लाह जाने क्या क्या खुदसाख्ता काम पन्द्रहवीं शाबान की रात और उसके दिन में बड़े भाव और आस्था व श्रद्धा के साथ किए जाते हैं, जिनका सहीह इस्लामी अक़ीदा से तनिक भी संबंध नहीं है, बल्कि यह उसके बिल्कुल विपरीत हैं। क्योंकि यह सारे काम न तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने स्वयं किए हैं और न इनका आदेश दिया है, और न ही इन्हें खुलफा-ए-राशिदीन, अन्य सहाबा, ताबेईन और सलफ ने किए हैं, जबकि वह लोगों में सब से अधिक खैर व भलाई और फज़ाइले-आमाल के अभिलाषी और इच्छुक थे। और इस संबंध में विर्णत हदीसों के ज़ईफ और मौज़ू -मनगढ़त- होने पर जम्हूर उलमा की सहमति है।

4. 15 शाबान को रोज़ा रखने का हुक्म :

जहाँ तक विशिष्ट रूप से केवल पन्द्रहवीं शाबान को रोज़ा रखने का प्रश्न है तो यह जाईज़ नहीं है ; क्योंकि इस दिन विशिष्ट रूप से रोज़ा रखने की कोई विशेषता नहीं है और न ही पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इस दिन रोज़ा रखने का कोई सबूत है। इसलिए बिना किसी धार्मिक प्रमाण के इस दिन को रोज़ा रखने के लिए सुनिश्चित करना ना-जाईज़ और बिद्अत है।

5. शाबान के अन्तिम दिन (शक्क के दिन) का रोज़ा रखना:

शाबान के 29 दिन पूरे होने के तीसवीं शाबान की रात को आसमान पर ग़ुबार या बादल छा जाने के कारण चाँद दिखाई न पड़े, और न ही दूसरे स्थान से चाँद देखे जाने की विश्वस्त सूचना मिले, तो ऐसी अवस्था में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फर्मान के अनुसार शाबान के तीस दिन पूरे करने चाहिए, इसलिए अगला दिन शाबान का समझा जाए गा, और उस दिन यह गुमान करके रोज़ा रखना जाईज़ नहीं होगा कि हो सकता है चाँद निकला हो और बादल के कारण हमें दिखाई नहीं दिया, अथवा यह ख्याल करना कि यदि कहीं से चाँद देखने की खबर आ गई तो रमज़ान का रोज़ा हो जाए गा, वर्ना नफ्ली रोज़ा होगा। ऐसा करना गलत और अवैद्ध है। इस दिन को हदीस में शक्क का (सिन्दग्ध अथवा अनिश्चित) दिन कहा गया है और इस दिन रोज़ा रखने से रोका गया है। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फर्मान है :

``अ्रगर आसमान अब्र-आलूद (बदली वाला ) हो जाए (और चाँद दिखाई न दे) तो शाबान के तीस दिन पूरे करो।´´ (सहीह बुख़ारी व मुस्लिम)

तथा अम्मार बिन यासिर रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं : ``जिस ने शक्क के दिन रोज़ा रखा उस ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ना-फर्मानी की।´´ (अबू दाऊद, नसाई, त्रिमिज़ी, इब्ने माजा)

- इसी प्रकार पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस बात से भी रोका है कि आदमी रमज़ान के इस्तिक़बाल में रमज़ान शुरू होने से एक दो दिन पहले ही रोज़ा रखना आरम्भ कर दे। किन्तु जिस आदमी की नफ्ली रोज़े रखने की आदत हो और वह रोज़ा अन्तिम दिनों में पड़ रहा है तो ऐसी सूरत में वह शाबान के अन्तिम दिनों में रोज़ा रख सकता है। (सहीह बुखारी व मुस्लिम)

- इसी तरह पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आधा शाबान बीत जाने के बाद (अर्थात 16 शाबान से) रोज़ा रखने से मना किया है, जैसाकि सुनन् त्रिमिज़ी और इब्ने माजा की सहीह हदीस में है।

लेकिन दूसरी सहीह हदीसों से तर्क मिलता है कि 15 शाबान के बाद रोज़े रखे जा सकते हैं, जैसाकि बुखारी व मुस्लिम की पूर्व हदीस में है।

इसी प्रकार स्वयं नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम शाबान के अधिकांश दिनों का रोज़ा रखते थे।

दोनों प्रकार की हदीसों को सामने रख कर यह बात स्पष्ट होता है कि 15 शाबान के बाद उस आदमी के लिए रोज़ा रखना मना है जो 15 शाबान के बाद रोज़ा रखने की शुरूआत कर रहा है।

लेकिन जो आदमी 15 शाबान से पहले ही से रोज़ा रखता रहा है, वह उसके बाद भी रोज़ा रख सकता है। इसी प्रकार जिस आदमी की रोज़ा रखने की कोई आदत है तो वह अपनी आदत के अनुसार 15 शाबान के बाद भी रोज़ा रख सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर कोई आदमी सोमवार और जुमेरात का रोज़ा रखता है तो वह 15 शाबान के बाद भी इन दिनों में रोज़ा रख सकता है।

अल्लाह तआला से दुआ है कि मुसलमानों को दीन की उचित समझ प्रदान करे और उन्हें बिद्आत व खुराफात की अथाह दलदल से निकाल कर सिराते-मुस्तक़ीम पर जमा दे। (लेखकः अताउर्रहमान ज़ियाउल्लाह)

الثلاثاء، 28 يوليو 2009

الأربعاء، 4 مارس 2009

ईद मीलादुन्नबी का उत्सव (ऐतिहासिक एंव धार्मिक दृश्य)

ईद मीलादुन्नबी का उत्सव

(ऐतिहासिक एंव धार्मिक दृश्य )

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

मैं अति मेहरबान और दयालु अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ।

हर प्रकार की प्रशंसा और गुण-गान सर्व संसार के पालनहार अल्लाह के लिए योग्य है जिस ने हमें अपनी महान कृपा से इस्लाम की नेमत से सम्मानित किया -जिस से बढ़ कर इस दुनिया में कोई अन्य नेमत नहीं- और उसे अपने अन्तिम सन्देष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हाथों पर सम्पूर्ण कर के हमारे लिए पसन्द कर लिया। तथा अल्लाह की कृपा और शान्ति अवतरित हों उस प्रतिष्ठित पैग़म्बर पर जिन्हों ने इस्लाम के प्रसार का कर्तव्य उम्मत की खैरखाही (शुभ चिंता) के साथ उत्तम ढंग से पूरा किया और उम्मत को एक उज्ज्वल पथ पर छोड़ कर गये जिस से वही व्यक्ति भटके गा जो अत्यन्त अभागा होगा।

अत: अब इस धर्म में किसी कमी या वृद्धि की कोई गुन्जाईश नहीं। किन्तु इस्लाम के दुश्मनों ने -जिन्हें इस्लाम का प्रभुत्व और फैलाव काटे खाता है और उन्हें क्रोध और ग़ुस्से से ग्रस्त कर देता है- कुछ लोगों के लिए बिद्अतों को संवार कर उन्हें अच्छे पोशाक में प्रस्तुत किया है और उन्हें ज़ुह्द, परहेज़गारी, अल्लाह की समीपता और रसूल से महब्बत के रूप में प्रकट किया है, जिस का आशय उनके धर्म को बिगाड़ना है ताकि सुन्नतें अपरिचित और अनजान हो जाएँ और उन का स्थान बिद्अतें ग्रहण कर लें। साथ ही साथ कुछ दुष्ट उलमा और तसव्वुफ वालों ने इसे लोगों के बीच सरदारी और कमाई का साधन बना कर इन बिद्अतों को अधिकाधिक फैलाया और प्रचलित किया यहाँ तक कि मुसलमानों में जंगल की आग के समान फैल गईं और साधारण लोगों ने इन्हें नेकी और पुण्य का कार्य समझकर अपनी आँखों से लगा लिया और इनकी सुरक्षा और संरक्षण को अनिवार्य समझने लगे।

ऐसी अवस्था में सुन्नत का पालन करना और बिद्अत के विरूद्ध उठ खड़े होना यथाशक्ति प्रत्येक मुसलमान विशेषकर धर्म ज्ञानियों का कर्तव्य है। निम्नलिखित लेख इसी श्रृंखला की एक कड़ी है।

वर्तमान समय में फैली हुई बिद्आत में से एक घृणित बिद्अत रबीउल-अव्वल की बारहवीं तारीख को पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस के उत्सव (जश्न) के रूप में मनाना है, जिसे दुनिया के विभिन्न देशों में मुसलमान बड़े हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। किन्तु इस जश्ने मीलाद का धार्मिक तथ्य क्या है? इसका ऐतिहासिक आधार क्या है? इस घिनावनी प्रथा का मुस्लिम समुदाय में कहाँ से चलन हुआ? और इसका अविष्कार करने वालों का इसके पीछे क्या उद्देश्य था? अधिकांश लोग इस से अपरिचित और अचेत हैं। यदि इसकी वास्तविकता को प्रकाश में लाया जाए और इसका अविष्कार करने वालों के मुख से पर्दा उठाया जाए तो सुन्नते रसूल के शैदाई और महब्बते रसूल के नाम पर जान निछावर करने वाले मुसलमान समझ-बूझ से काम लेते हुए इस असत्य और अवैद्ध परम्परा से अपने आप को दूर और अलग-थलग रखें गे और इस का स्वयं भी विरोध करें गे।

क़ुर्आन और हदीस में इसका उल्लेख होना तो बहुत दूर की बात है, कहीं इसका संकेत तक भी नहीं मिलता।

पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने पूरे जीवन काल में न तो स्वयं अपना जन्म दिवस मनाया, न अपने किसी सहाबी को इसका आदेश दिया और न ही अपने मरने के बाद इसे मनाने का कोई संकेत दिया। हाँ, आप ने अपने साथियों को इस बात की चेतावनी अवश्य दी कि कहीं ईसाईयों के समान मेरी प्रशंसा करने में सीमा को पार न कर जाना।

इस धर्ती पर सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से बढ़ कर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अपार महब्बत करने वाला, पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नतों का सर्वाधिक ज्ञान रखने वाला और पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत -धर्म शास्त्र- का अत्यधिक पालन करने वाला कोई नहीं। फिर भी किसी एक -मात्र एक- सहाबी ने भी आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस को नहीं मनाया।

सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम के पश्चात सर्वश्रेष्ठ लोग वह हैं जो उनके बाद आए, जिन्हें ``ताबईन´´ के नाम से जाना जाता है। इनके समय काल में भी पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म दिवस नहीं मनाया गया। ताबईन के बाद के समय काल में भी किसी ने ईद मीलादुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का त्योहार नहीं मनाया।

चार प्रसिद्ध इमाम अर्थात: इमाम अबू हनीफा, इमाम मालिक, इमाम शाफई और इमाम अहमद -रहिमहुमुल्लाह अजमईन- जिनका मुसलमानों के निकट बहुत बड़ा महत्व और इस्लाम की शिक्षा के प्रसारण में बहुत बड़ा योगदान है( इन में से किसी एक इमाम ने भी पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस को न तो स्वयं मनाया और न ही इसे मनाने का किसी को सुझाव दिया। बल्कि इनके समय काल में इसका नाम तक नहीं सुना गया।

प्रश्न उठता है कि यह बिद्अत कब, कैसे और कहाँ से आई? इस का अविष्कार -ईजाद- करने वाले मुसलमान भी थे या? ....

सब से पहले जिस ने यह बिद्अत ईजाद की वह `बनू उबैद अल-क़द्दाह´ हैं, जो अपने आप को फातिमी कहते थे और अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु के संतान की ओर इन्तिसाब करते थे। वास्तव में वह `बातिनी धर्म´ के संस्थापकों में से हैं, उनका दादा `इब्ने दीसान´ -जो `अल-क़द्दाह´ के लक़ब से प्रसिद्ध, जाफर बिन मुहम्मद अस-सादिक़ का आज़ाद किया हुआ ग़ुलाम और `अहवाज़´ का बासी था- ईराक़ में बातिनी धर्म के संस्थापकों में से था। फिर वह मराकश चला गया और वहाँ उस ने अक़ील बिन अबी तालिब की ओर अपने को मन्सूब किया और यह गुमान किया कि वह उनके वंश से है। जब उसके साथ कट्टर राफिज़ियों -शीयों- का एक समूह सम्मिलित हो गया तो उस ने यह दावा किया कि वह मुहम्मद बिन इस्माईल बिन जाफर अस-सादिक़ के वंश से है। उन्हों ने उसके इस दावा को स्वीकार कर लिया, हालांकि वास्तविकता यह है कि मुहम्मद बिन इस्माईल बिन जाफर अस-सादिक़ ने अपनी कोई संतान नहीं छोड़ी थी। उसके मानने वालों में से हमदान बिन क़रमत भी था जिसकी ओर कुख्यात क़रामतह की निस्बत है। फिर एक समय के पश्चात उन में सईद बिन अल-हुसैन बिन अहमद बिन अब्दुल्लाह बिन मैमून बिन दीसान अल-क़द्दाह के नाम से प्रसिद्ध व्यक्ति प्रकट हुआ और उसने अपना नाम व नसब बदल दिया और अपने मानने वालों से कहा कि मैं उबैदुल्लाह बिन अल-हसन बिन मुहम्मद बिन इस्माईल बिन जाफर अस-सादिक़ हूँ। इस प्रकार मराकश में उसके फित्ने का उदय हुआ।

किन्तु इल्मे अन्साब (वंशावली शास्त्र)के माहिर अन्वेषकों ने इस के इस नसब के दावा का खण्डन किया। चुनांचे रबीउल-आख़िर 402 हिज्री में फुक़हा, मुहद्देसीन, क़ाज़ियों और सदाचारियों की एक जमाअत ने महज़रनामें (हस्ताक्षरित पत्र) तैयार किए जो फातिमियों -उबैदियों- के नसब के खंडन पर आधारित थे और सब ने यह गवाही दी कि मिस्र का शासक: मन्सूर बिन नज़ार बिन मअद बिन इस्माईल बिन अब्दुल्लाह बिन सईद जब मराकश के देश में पहुँचा तो वहाँ उस ने अपना नाम उबैदुल्लाह और लक़ब महदी रख लिया, उसके पूर्वज ख़वारिज थे, अली बिन अबी तालिब की औलाद में उनका कोई नसब नहीं है, और जो कुछ इन्हों ने दावा किया है वह बातिल और झूठ है, बल्कि अली बिन अबी तालिब के घराने के किसी व्यक्ति के बारे में हमें यह ज्ञान नहीं कि उस ने इन लोगों को खवारिज घोषित करने में संकोच किया हो। मिस्र का शासक और उसके पूर्वज कुफ्फार (नास्तिक), फुस्साक़ (पापी), फुज्जार (दुराचारी), मुलहिद (अधर्मी ) और ज़िन्दीक़ (धर्म भ्रष्ठ) हैं, इस्लाम के इनकारी और मजूसियत (अग्नि पूजा) और सनवियत के श्रद्धालू हैं। इन्हों ने हुदूद (धार्मिक दंड) को मुअत्तल (निलंबित)कर दिया, शरमगाहों को वैध कर दिया, शराब को हलाह कर दिया है और रक्तपात का बाज़ार गर्म कर रखा है। अंबिया -ईश्दूतों- को गाली देते हैं, पूर्वजों पर धिक्कार करते हैं और प्रमेश्वरता का दावा करते हैं। इस महज़र (घोषणा पत्र) पर हनफी, मालिकी, शाफई, हंबली, अहले हदीस, अहले कलाम, अनसाब के माहिर अन्वेषकों, अलवियों और साधारण लोगों के हस्ताक्षर उपस्थित हैं, जो सब के सब उनके नसब का खण्डन करते हैं और उन्हें मजूस (अग्नि पूजक) या यहूद की औलाद में से घोषित करते हैं, उदाहरणत: इन हस्ताक्षर कर्ताओं में: अल-मुर्तज़ा, अर-रज़ी, अबुल क़ासिम अल-जज़री, अबू हामिद अल-असफराईनी, अबुल हसन क़ुदूरी, अबु अब्दुल्लाह बैज़ावी, अबु अब्दुल्लाह सैमरी और अबुल क़ासिम तनूखी हैं। कुछ उलमा ने इनके खण्डन में पुस्तकें लिखी हैं और इस बात से पर्दा उठाया है कि इनका धर्म प्रत्यक्ष रूप से रफ्ज़ और तशय्यु था और प्रोक्ष रूप से मात्र कुफ्र था। (अल बिदाया वन निहाया, इब्ने कसीर 5ध्537-540)

फातिमियों -उबैदियों- का प्रवेश मिस्र में 5 रमज़ान 362 हिज्री में हुआ, और यही उन के शासन काल का आरम्भ है। चुनांचे साधारणत: जन्म दिवस (बर्थ डे, बरसी ) मनाने और विशेषकर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का जश्न मनाने की बिद्अत उबैदियों के काल में प्रकट हुई और इन्हीं लोगों ने पहली बार मुसलमानों के लिए अवैध -बिदई- जश्नों और उत्सवों का द्वार खोला, यहाँ तक कि ये लोग पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म दिवस, अली बिन अबी तालिब का जन्म दिवस, हसन का जन्म दिवस, हुसैन का जन्म दिवस और फातिमा ज़हरा का जन्म दिवस मनाने के साथ साथ, मजूसियों और ईसाईयों के त्योहारों को भी बड़े हर्ष व उल्लास से मनाते थे, उदाहरणत: नौ रोज़, गतास, मीलादे मसीह (क्रिस मस् ) और अदस आदि। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वह इस्लाम से कितना दूर और इस के विरोधी थे। तथा यह इस बात का भी तर्क है कि वह उपरोक्त उत्सवों का संगठन पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आप के वंश से महब्बत के कारण नही करते थे, बल्कि इन उत्सवों का अविष्कार करके इनके पीछे उनका उद्देश्य अपने बातिनी धर्म और असत्य विचारधारा को लोगों के बीच फैलाना और प्रचार करना तथा उन्हें सत्य धर्म और शुद्ध आस्था से विमुख करना था।

प्रश्न यह है कि क्या कोई बुद्धिमान और अपने धर्म से आस्था रखने वाला मुसलमान इन उबैदियों -फातिमियों- की घढ़ी हुई इस घृणित बिद्अत को मनाना पसन्द करेगा!!!

इसी पर बस नहीं, बल्कि उस समय काल के सामाजिक स्थिति पर दृष्टि करने से ज्ञात होता है कि उबैदियों की राजनीति केवल एक उद्देश्य को प्राप्त करने पर आकषिZत थी और वह था पूरे संघर्ष और नि:स्वार्थता के साथ लोगों को अपने धर्म को स्वीकार करने पर तत्पर करना और उसे मिस्र तथा आस पास के अपने प्रशासन छेत्रों में सामान्य धर्म बनाना। इसके चलते उबैदी शासक यहूदियों और ईसाईयों के साथ अत्यन्त सहानुभूति और रिआयत का व्यवहार करते थे, उन्हें बड़े-बड़े पदों और मन्त्रालयों पर नियुक्त करते थे। दूसरी ओर अहले-सुन्नत के साथ उनका व्यवहार उसके विपरीत था, तीनों ख़ुलफा (अबु बक्र, उमर, उसमान रज़ियल्लाहु अन्हुम) और इनके अतिरिक्त अन्य सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम और सामान्य सुिन्नयों को मिंबर व मेहराब से लानत किया जाता था। 372 हिज्री में पूरे मिस्र देश में तरावीह की नमाज़ बन्द कर दी गई। 395 हिज्री में मिस्र के भीतर समस्त मिस्जदों, इमारतों, भवनों, कि़ब्रस्तानों और दुकानों पर पूर्वजों के धिक्कार और लानत पर सम्मिलित बातें लिखवाई गईं और उन्हें रंगों से रंगा गया। इन सभी चीज़ों से बढ़ कर यह कि उबैदी शासक -मनसूर बिन नज़ार- ने उलूहियत -ईश्वर होने- का दावा किया और लोगों को आदेश दिया कि जब खतीब मिंबर पर उस का नाम ले तो उसके सम्मान में सब पंक्ति बनाकर खड़े हो जायें, चुनांचे उसके समस्त देशों में ऐसा ही किया गया, यहाँ तक कि हरमैन शरीफैन में भी। मिस्र वालों को विशेष रूप से यह आदेश था कि जब उसका नाम आए तो वह सज्दे में गिर जाया करें।

क्या फिर भी एक गैरतमन्द मुसलमान इन इस्लाम के शत्रुओं के अविष्कारित घिनावनी बिद्अत को मनाने को पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से महब्बत, श्रद्धा और सम्मान का नाम दे गा?!!!

इस्लामी भाईयो! यह है इस मीलाद की ऐतिहासिक पृिष्ठ भूमि -जिसे आज बहुत सारे मुसलमान बड़े ही हर्ष व उल्लास के साथ मनाते हैं- जिस की ओट में उबैदियों ने अपने बातिनी धर्म का प्रचार एंव प्रसार किया तथा सुन्नत और अहले सुन्न्त का सर्वनाश किया।

इसी लिए उलमाये-सुन्नत ने जब से यह बिद्अत ईजाद हुई है, इस का खण्डन करते आए हैं। और हर युग में इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जात रहा है( ताकि जो लोग इस बिद्अत में लिप्त हैं उन्हें सावधान किया जाए और इस से संबंधित उठाए जाने वाले प्रश्नों और सन्देहों का निराकरण किया जाए।

क़ुर्आन एंव हदीस का साधारण ज्ञान रखने वाला मुसलमान भी यदि न्याय एंव बुद्धि से काम ले तो इस मस्अले की वास्तविकता जानने में उसे कठिनाई नहीं होगी, किन्तु बुरा हो तअस्सुब और हठ का जो आदमी को अन्धा बना देती हैं। बहर हाल सामान्य मुसलमानों की शुभ चिन्ता और ख़ैरखाही के कर्तव्य के आधार पर इस से संबंधित एक फत्वा प्रस्तुत किया जा रहा है।

सउदी अरब के एक महा धर्म-शास्त्री एंव भाष्य कार अल्लामा मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह से प्रश्न किया गया कि: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का उत्सव मनाना कैसा है? तो उन्हों ने उत्तर दिया:

प्रथम: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म की रात निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है, बल्कि वर्तमान युग के कुछ ज्ञानियों की तह्क़ीक यह है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म दिवस -निश्चित रूप से- रबीउल-अव्वल की नवीं रात है, इसकी बारहवीं रात नहीं है। इस आधार पर रबीउल-अव्वल की बारहवीं तारीख को पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का जश्न मनाना ऐतिहासिक रूप से निराधार और वस्तुस्थिति के विरूद्ध है।

द्वितीय: शरई -धार्मिक- दृष्टि कोण से भी जश्न मीलाद मनाना अनाधार और अवैध है। क्योंकि यदि वह अल्लाह की शरीअत -धर्म-शास्त्र- में से होता तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उसे अवश्य मनाते, या उम्मत को इसकी सूचना देते। और यदि आप ने इसे मनाया होता या उम्मत को इस की सूचना दी होती तो इस का उल्लेख सुरक्षित रूप से पाया जाना अनिवार्य था। इसलिए कि अल्लाह तआला का फर्मान है

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``हम ने ही इस ज़िक्र -क़ुरआन- को उतारा है और हम ही इस की सुरक्षा करने वाल हैं।´´ (सूरतुल-हिज्र:9)

जब उपरोक्त किसी चीज़ का प्रमाण नहीं है तो ज्ञात हुआ कि यह अल्लाह तआला के धर्म में से नहीं है, और जब वह अल्लाह तआला के धर्म में से नहीं है तो हमारे लिए जाईज़ -वैध- नहीं है कि हम इस के द्वारा अल्लाह तआला की उपासना करें तथा इस के द्वारा अल्लाह तआला की निकटता प्राप्त करें। जब अल्लाह तआला ने हमारे लिए अपनी निकटता प्राप्त करने के लिए एक निश्चित मार्ग एंव पथ निर्धारित कर दिया है और वह मार्ग वही है जिसे पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दर्शाया और दिखाया है, तो फिर हमारे लिए -जबकि हम उसके दास और बन्दे हैं- यह कैसे वैध हो सकता है कि उस की निकटता प्राप्त करने के लिए अपनी ओर से कोई मार्ग और पथ अविष्कार करें? यह अल्लाह तआला के प्रति एक अपराध है कि हम उस के धर्म में किसी ऐसी चीज़ को वैध घोषित कर लें जिस का इस धर्म से कोई संबंध और लगाव नहीं। तथा इस से अल्लाह तआला के निम्नलिखित कथन को झुठलाना निष्कर्षित होता है:

``आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को सम्पूर्ण कर दिया और तुम पर अपनी नेमत -अनुकम्पा और उपकार- भर पूर कर दी।´´ (सूरतुल माईदा:3)

अत: हम कहते हैं कि यह जश्न मीलाद यदि धर्म के पूर्णता में से है तो इसका पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु से पहले मौजूद होना अनिवार्य है, और यदि वह धर्म के पूर्णता में से नहीं है तो उस का धर्म से होना सम्भव नहीं, इस लिए कि अल्लाह तआला का क्थन है कि:

``आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को सम्पूर्ण कर दिया।´´

और जो व्यक्ति यह गुमान करे कि वह कमाले दीन -धर्म के पूर्णता- में से है, हालांकि उस का वजूद पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद हुआ है, तो उस का यह कहना इस आयत को झुठलाता है।

इस में कोई सन्देह नहीं कि वह लोग जो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का जश्न मनाते हैं उनका उद्देश्य पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान, आप की महब्बत का प्रदर्शन और लोगों के भीतर इस जश्न में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्रति मनोभाव को उभारना है। और यह समस्त चीज़ें इबादात -उपासना- में से हैं( पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रेम इबादत -उपासना- है, बल्कि आदमी का ईमान उस समय तक परिपूर्ण नहीं हो सकता जब तक कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उस के निकट उसके प्राण, उसकी संतान, उसके माता पिता और दुनिया के समस्त लोगों से अधिक प्रिय न हो जायें, तथा पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान करना इबादत है, इसी प्रकार पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्रति भावना को उभारना धर्म में से है (क्योंकि इस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत की ओर रूजहान (अभिरूचि) पाया जाता है। अत: अल्लाह तआला की निकटता प्राप्त करने के लिए और उस के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सम्मान के लिए पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का जश्न मनाना इबादत हुआ, और जब यह इबादत है तो कभी भी यह जाइज़ -वैध- नहीं है कि अल्लाह तआला के धर्म में ऐसी चीज़ ईजाद की जाए जो उस का भाग नहीं है। इसलिए जश्न मीलाद मनाना बिद्अत और हराम -निषिध- है।

इस के अतिरिक्त हम सुनते हैं कि इस जश्न में ऐसे मुनकरात -अवैध काम- पाए जाते हैं जिन्हें न शरीअत वैध ठहराती है और न ही हिस्स और बुद्धि। इस में लोग ऐसे क़सीदे -नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रशंसा में कविताएं- गाते हैं जिन में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में ग़ुलु -अतिश्योक्ति- पाया जाता है, यहाँ तक कि वह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अल्लाह तआला से बड़ा ठहरा देते हैं। अल्लाह की पनाह!

उन्हीं मुनकरात में से यह भी है जो हम कुछ जश्न मनाने वालों की मूर्खता और बुद्धिहीनता के बारे में सुनते हैं कि जब जन्म कथा पढ़ने वाला आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म के वर्णन पर पहुँचता है तो समस्त उपस्थित लोग एक साथ खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की रूह उपस्थित हो गई( इस लिए हम उसके सम्मान में खड़े होते हैं। यह अत्यन्त मूर्खता और बुद्धिहीनता है। तथा अदब और सभ्यता यह नहीं है कि वह खड़े हो जायें। इसलिए कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने लिए खड़े होने को पसन्द नहीं करते थे। तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम, -जबकि वह लोगों मे सब से अधिक आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से महब्बत करने वाले और हम से कहीं अधिक पैग़म्बर का सम्मान करने वाले थे-, आप के जीवन में आप के लिए खड़े नहीं होते थे( क्योंकि वह जानते थे कि आप इस चीज़ को नापसन्द करते हैं, तो फिर इन काल्पनिक चीज़ों का क्या ऐतिबार।

यह बिद्अत -जश्न मीलाद की बिद्अत- तीनों प्रतिष्ठित सदियों के पश्चात अस्तित्व में आई है, और इस के अन्दर ऐसे मुन्करात किए जाते हैं जिन से असल धर्म में ख़लल (बिगाड़) आता है। इस के अतिरिक्त इस के अन्दर पुरूष एंव स्त्री का इख़तिलात (मिश्रण) और अन्य बुराईयां होती हैं। (फतावा अरकानुल-इस्लाम, लेखक: मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह पृष्ठ सं. 172-174)