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الاثنين، 13 سبتمبر 2010

शव्वाल के छ: रोज़ों के साथ रमज़ान की क़ज़ा को एक ही नीयत में एकत्रित करना शुद्ध नहीं है

शव्वाल के छ: रोज़ों के साथ रमज़ान की क़ज़ा को एक ही नीयत में एकत्रित करना शुद्ध नहीं है

क्या यह जाइज़ है कि मैं शव्वाल के छ: रोज़े उन दिनों की क़ज़ा की नीयत के साथ रखूं जिन दिनों का मैं ने रमज़ान में मासिक धर्म के कारण रोज़ा तोड़ दिया था ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

ऐसा करना शुद्ध नहीं है, क्योंकि शव्वाल के छ: दिनों के रोज़े रमज़ान के पूरे महीने के रोज़े रखने के बाद ही हो सकते हैं।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह "फतावा अस्सियाम" (438) में फरमाते हैं :

"जिस व्यक्ति ने अरफा के दिन, या आशूरा के दिन रोज़ा रखा और उसके ऊपर रमज़ान की क़ज़ा बाक़ी है तो उसका रोज़ा सही (शुद्ध) है, लेकिन यदि वह यह नीयत करे कि वह इस दिन रमज़ान की क़ज़ा का रोज़ा रख रहा है तो उसे दो अज्र प्राप्त होगा : क़ज़ा के अज्र के साथ अरफा के दिन का अज्र या आशूरा के दिन का अज्र। यह साधारण नफ्ल (ऐच्छिक) रोज़े का मामला है जो कि रमज़ान के साथ संबंधित नहीं होता है, परन्तु जहाँ तक शव्वाल के छ: रोज़ों की बात है तो वह रमज़ान के साथ संबंधित है और वह रमज़ान की क़ज़ा के बाद ही हो सकता है। अत: यदि वह क़ज़ा करने से पूर्व उसके (यानी शव्वाल के) रोज़े रखता है तो उसे उसका अज्र नहीं मिलेगा, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "जिस व्यक्ति ने रमज़ान का रोज़ा रखा, फिर उसके पश्चात ही शव्वाल के महीने के छ: रोज़े रखे तो गोया कि उसने ज़माने भर का रोज़ा रखा।" और यह बात सर्वज्ञात है कि जिसके ऊपर क़ज़ा बाक़ी हो तो वह रमज़ान का (मुकम्मल) रोज़ा रखने वाला नहीं समझा जायेगा यहाँ तक कि वह कज़ा को मुकम्मल कर ले।" (इब्ने उसैमीन की बात समाप्त हुई)।

الأربعاء، 8 سبتمبر 2010

ज़कातुल फित्र का हुक्म

ज़कातुल फित्र का हुक्म

प्रश्नः

क्या यह हदीस सहीह है कि "रमज़ान का रोज़ा उठाया नहीं जाता यहाँ तक कि ज़कातुल फित्र अदा कर दिया जाये" ?

और यदि मुसलमान रोज़ेदार ज़रूरतमंद है, ज़कात के निसाब का मालिक नहीं है तो क्या उक्त हदीस के सहीह होने के कारण या उसके अलावा अन्य सुन्नत से प्रमाणित सही शरई प्रमाण के कारण उस पर ज़कातुल फित्र का भुगतान करना अनिवार्य है ?

उत्तरः

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

सदक़तुल फित्र हर उस मुसलमान पर अनिवार्य है जिसके ऊपर स्वयं उसका खर्च अनिवार्य है यदि उसके पास ईद के दिन और उसकी रात को उसके भोजन और उसके अधीन लोगों के भोजन से अतिरिक्त एक साअ (गल्ला इत्यादि) बाक़ी बचता है।

इस विषय में असल (मूल प्रमाण) वह हदीस है जो इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से प्रमाणित है कि उन्हों ने फरमाया:

"अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक साअ खजूर, या एक साअ जौ ज़कातुल फित्र, मुसलमानों में से गुलाम और आज़ाद, पुरूष और स्त्री, छोटे और बड़े पर अनिवार्य कर दिया है, और उसे लोगों के नमाज़ के लिए निकलने से पूर्व अदा कर देने का आदेश दिया है।" (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम, और हदीस के शब्द सहीह बुखारी के हैं)

तथा दूसरा प्रमाण अबू सईद खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस है कि उन्हों ने फरमाया:

"जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमारे बीच मौजूद थे तो हम ज़कातुल फित्र एक साअ खाना (खादपदार्थ), या एक साअ खजूर, या एक साअ जौ, या एक साअ किशमिश, या एक साअ पनीर निकालते थे।" (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम)

तथा आदमी के लिए शहर के आहार उदाहरण के तौर पर चावल इत्यादि से एक साअ निकालना काफी है।

यहाँ साअ से अभिप्राय नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का साअ है और वह एक औसत आदमी की दोनों हथेलियों से चार लप होता है।

यदि कोई आदमी ज़कातुल फित्र नहीं निकालता है तो वह दोषी और गुनाहगार है और उसके ऊपर क़ज़ा करना (यानी समय निकल जाने के बाद भी उसे निकालना) अनिवार्य है।

जहाँ तक उस हदीस का संबंध है जिसका आप ने उल्लेख खिया है, तो हमें उसके सही होने का ज्ञान नहीं है।

हम अल्लाह तआला से दुआ मांगते हैं कि वह आप को तौफीक़ प्रदान करे, तथा हमारे और आप के लिए कथन ओर कर्म को सुधार दे। और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला (शक्ति का स्रोत) है।

इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति के फतावा (9/364) से।

الأربعاء، 18 أغسطس 2010

रमज़ान के महीने में फिल्मों, धारावाहिकों और खेल में समय बिताना

रमज़ान के महीने में फिल्मों, धारावाहिकों और खेल में समय बिताना

कुछ रोज़ेदार रमज़ान के दिन का अधिकतर समय वीडियो और टीवी पर फिल्मों और धारावाहिकों (सीरियल) के देखने और कार्ड (ताश, पत्ते) खेलने में गुज़ारते हैं, तो इसका क्या हुक्म है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

रोज़ेदार तथा अन्य मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह सभी समयों में जो कुछ करता और जो कुछ छोड़ता है, उस में अल्लाह सुब्हानहु व तआला से डरता रहे, तथा वह अल्लाह तआला की हराम की हुई (निषेध) चीज़ को देखने से बचे, जैसे कि अश्लील फिल्में जिन में अल्लाह तआला की वर्जित की हुई चीज़ें नग्न और अर्द्ध नग्न छवियां (तस्वीरें), और बुरी और घृणित बातें प्रस्तुत की जाती हैं। इसी प्रकार जो टीवी पर अल्लाह तआला की शरीअत के विरूध छवियां, गाने, संगीत, गाने-बजाने के यन्त्र (वाद्ययन्त्र) और भ्रामक विज्ञापन और भ्रष्ट दावे प्रकाशित किये जाते हैं। इसी तरह प्रत्येक मुसलमान पर, चाहे वह रोज़ेदार हो या कोई अन्य, यह अनिवार्य है कि वह खेल (लह्व व लईब) के यन्त्रों से खेलने, जैसे कार्ड (पत्ते, ताश) इत्यादि खेलने से बचे। क्योंकि इस में बुराई (निषेध चीज़) का देखना और बुराई का करना पाया जाता है, तथा इस में दिल की कठोरता, उसकी बीमारी, उसके अल्लाह की शरीअत का अपमान करने (उसे कमतर समझने) और अल्लाह तआला की अनिवार्य की हुई चीज़ों जैसे जमाअत के साथ नमाज़ से उपेक्षा करने या अन्य कर्तव्यों के छोड़ने और बहुत सी हराम चीज़ों में पड़ने का कारण बनना है। अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है :

"और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बेकार (लग्व) बातों को मोल लेते हैं कि अज्ञानता के साथ लोगों को अल्लाह के मार्ग से बहकायें और उसे हंसी (मज़ाक, उपहास) बनायें, यही वे लोग हैं जिनके लिए अपमानजनक अज़ाब (यातना) है। जब उस के सामने हमारी आयतों का पाठ किया जाता है तो घमण्ड करते हुए इस तरह मुंह फेर लेता है मानो कि उस ने उन्हें सुना ही नहीं गोया कि उस के दोनों कानों में डाट लगे हुए हैं, आप उसे कष्टदायक यातना की सूचना दे दीजिये।" (सूरत लुक़मान : 6 - 7)

तथा अल्लाह तआला सूरत अल-फुरक़ान के अन्दर अपने बन्दों के गुण का उल्लेख करते हुए फरमाता है :

"और जो लोग झूठ (बुरी बात) पर उपस्थित नहीं होते और जब किसी बेकार चीज़ पर उनका गुज़र होता है तो शराफत (सज्जनता) के साथ गुज़र जाते हैं।" (सूरतुल फुरक़ान : 72)

आयत में "अज़्ज़ूर" (अर्थात् झूठ) का शब्द सभी प्रकार की बुराई को सम्मिलित है, और "ला यश्हदूना" का अर्थ उपस्थित नहीं होते (हाज़िर नहीं होते) के है।

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं : "मेरी उम्मत में ऐसे लोग होंगे जो व्यभिचार, रेशम, शराब और गाने बजाने के यन्त्र (वाद्ययन्त्र) को हलाल ठहरा लेंगे।" इस हदीस को इमाम बुखारी ने अपनी सहीह में सुदृढ़ शब्दों के साथ "तालीक़न" रिवायत किया है।

तथा इसलिए भी कि अल्लाह सर्वशक्तिमान ने मुसलमानों पर हराम (निषेध) में पड़ने के साधनों (कारणों) को वर्जित ठहराया है, और इस में कोई सन्देह नहीं कि बुरी फिल्मों और टीवी पर प्रकाशित की जाने वाली बुराईयों को देखना, उन बुराईयों में पड़ने या उन को नकारने में लापरवाही करने या लचीला होने के साधनों (कारणों) में से है। और अल्लाह तआला ही से सहायता मांगी जा सकती है।

फतावा शैख इब्ने बाज़ रहिमहुल्लाह 4/158.