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السبت، 18 أغسطس 2018

अरफ़ा के दिन की फज़ीलतें

अरफ़ा के दिन की फज़ीलतें


अरफा के दिन की फज़ीलतें क्या हैं?
हर प्रकार की प्रशंसा व गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।
अरफा के दिन की फज़ीलतों में से कुछ यह हैं :
1 – यह इस्लाम धर्म को मुकम्मल करने और नेमत को पूरा करने का दिन है।
सहीहैन (सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम) में उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि एक यहूदी आदमी ने उनसे कहा : ऐ अमीरुल मोमिनीन, आप लोग अपनी किताब (क़ुरआन) में एक आयत पढते हैं, यदि वह आयत हम यहूदियों पर उतरी होती तो हम उस दिन को ईद (त्योहार) का दिन बना लेते। उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने उससे पूछा कि वह कोन सी आयत है? य़हूदी ने बताया कि वह आयत यह है :
(الیوم اکملت لکم دینکم واتممت علیکم نعمتی و رضیت لکم الاسلام دینا) (المائدۃ :۳)  
आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को मुकम्मल कर दिया। और तुम पर अपनी नेमतें पूरी कर दीं। और तुम्हारे लिए इस्लाम को घर्म के रूप में पसन्द कर लिया।‘’ (तूरतुल मायदाः 3)
उमर रज़ियल्लाहु अन्हु कहने लगेः हमें उस दिन और जगह का ज्ञान है जब वह आयत नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर नाज़िल (उतरी) हुई। वह शुक्रवार का दिन था और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अरफा मे ठहरे थे।
2 – यह (अरफात में) ठहरने वालों के लिए ईद का दिन हैः
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ‘’अरफा का दिन, क़ुर्बानी का दिन (10 ज़ुल-हिज्जा) और तशरीक़ के दिन (11, 12, 13 ज़ुल-हिज्जा) हम इस्लाम के अनुयायियों (मुसलमानों) के लिए ईद के दिन हैं, तथा वे खाने और पीने के दिन हैं।‘’ (इसे अह्ले सुनन ने रिवायत किया है)।
तथा उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : यह - अर्थात आयत ‘’अल-यौमा अकमल्तो’’ - शुक्रवार और अरफा के दिन अवतरित हुई, और अल्लाह का शुक्र है कि यह दोनों दिन हमारे लिए ईद के दिन हैं।‘’
3 – यह वह दिन है जिसकी अल्लाह ने क़सम खाई हैः
और महान अस्तित्व महान ही की क़सम खाता है। अरफा के दिन को अल्लाह के इस फरमान में ‘’मशहूद दिन’’ कहा गया है : " وشاهد ومشهود " البروج :3 अर्थात : क़सम है हाज़िर होने वाले और हाज़िर किये गये दिन की। (सूरतुल बुरूजः 3)
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ‘’वादा किए गए दिन से अभिप्राय क़ियामत (परलोक) का दिन है, और हाज़िर किए गऐ दिन से अभिप्राय अरफा का दिन है और हाज़िर होने वाले दिन से अभिप्राय जुमा का दिन है।‘’ इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है और अल्बानी ने हसन क़रार दिया है।
और यही दिन ‘’अल-वत्र’’ है जिस की अल्लाह ने अपने इस फरमान में क़सम खाई है :(والشفع والوتر) الفجر :3 अर्थात : क़सम है जुफ्त और त़ाक़ (युग्म और अयुग्म) की। (सूरतुल फज्रः 3)
इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहते हैं : जुफ्त (युग्म) से अभिप्राय क़ुर्बानी का दिन है और ताक़ (अयुग्म) से अभिप्राय अरफा का दिन है। यही कथन इक्रमा और ज़ह़्ह़ाक का भी है।
4 –इस दिन का रोज़ा रखना दो साल के पापों का कफ्फारा (प्रायश्चित) है।
अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अरफा के दिन के रोज़े के बारे में प्रश्न किया गया तो आप ने फरमाया : ‘’यह पिछले एक वर्ष और आने वाले एक वर्ष के पापों का कफ्फारा (प्रायश्चित) है।‘’ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
परंतु यह रोज़ा हाजी के अलावा लोगों के लिए मुस्तहब है। हाजी के लिए इस दिन का रोज़ा मसनून नहीं है। क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस दिन का रोज़ा नहीं रखा था। तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है की आप ने अरफा में अरफा के दिन का रोज़ा रखने से मना किया है।
5 – यही वह दिन है जिसमें अल्लाह ने आदम की संतान से प्रतिज्ञा लिया था।
इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : अल्लाह ने आदम की संतान से नोमान नामी स्थान – अर्थात अरफा - में प्रतिज्ञा लिया। आदम की पीठ से उनकी सब संतान को निकाला और उन्हें अपने सामने ज़र्रों की तरह फैला कर उन से पूछा :  ‘’क्या मैं तुम्हरा रब नहीं हूँ ? सब ने कहा, क्यों नहीं। हम सब (तेरे रब होने की) गवाही देते हैं। ( ऐसा इसलिए किया) ताकि तुम लोग क़ियामत के दिन यह न कहने लगो  कि हम तो बस अनजान थे। या यूं कहो कि पहले पहले शिर्क तो हमारे बाप-दादा ने किया, हम तो उनके बाद उनकी  सन्तति  मे हुए, तो क्या तू इन ग़लत राह वालों के कार्य पर हमको विनष्ट करेगा?’’ (अलआराफ : 172-173) इसे अहमद ने रिवायत किया है और अल्बानी ने इसे सहीह कहा है। इस तरह यह कितना ही महान दिन है और यह कितनी ही महान प्रतिज्ञा है।
6 – यह पापों के क्षमा, नरक से मुक्ति और अरफात के मैदान में ठहरनेवालों पर गर्व का दिन हैः
सहीह मुस्लिम में आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ‘‘अल्लाह तआला अरफा के दिन से अधिक किसी दूसरे दिन बन्दों को आग से मुक्त् नहीं करता। निःसंदेह अल्लाह समीप होता है और स्वर्गदूतों के समक्ष उन पर गर्व करता है और कहता है : ये लोग क्या चाहते हैं?’’
इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ‘’अल्लाह तआला अरफा की शाम अरफा में ठहरनेवालों पर गर्व करते हुए कहता है : मेरे इन बन्दों को देखो, ये लौग मेरे पास धूल मिट्टी से अटे हुए आए हैं।‘’ इसे अहमद ने रिवायत किया है और अल्बानी ने सहीह कहा है।
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद


الاثنين، 13 سبتمبر 2010

यदि शेष दिन पर्याप्त नहीं हैं तो क्या वह क़ज़ा करने से पहले शव्वाल के छ: रोज़े से शुरूआत करेगा

यदि शेष दिन पर्याप्त नहीं हैं तो क्या वह क़ज़ा करने से पहले शव्वाल के छ: रोज़े से शुरूआत करेगा ?

क्या रमज़ान के तोड़े हुए रोज़ों की कज़ा करने से पहले शव्वाल के छ: रोज़े रखना जाइज़ है यदि (शव्वाल के) महीने के जो दिन बाक़ी बचे हैं वे उन दोनों का एक साथ रोज़ा रखने के लिए काफी नहीं हैं ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

शुद्ध कथन के अनुसार शव्वाल के छ: रोज़े रखना रमज़ान के रोज़ों को पूरा करने से संबंधित है, और इस बात पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फरमान तर्क है कि :"जिस व्यक्ति ने रमज़ान का रोज़ा रखा, फिर उसके पश्चात ही शव्वाल के महीने के छ: रोज़े रखे तो वह ज़माने भर (आजीवन) रोज़ा रखने के समान है।" (सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 1164)

इस हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान "सुम्मा" (अर्थात फिर) हरफे अत्फ (समुच्चय बोधक अक्षर) है जो अनुक्रम और एक के पीछे दूसरे के होने को दर्शाता है, जिस से पता चलता है कि सर्व प्रथम रमज़ान के रोज़े को पूरा करना ज़रूरी है (चाहे वह अदा हो या क़ज़ा), फिर उसके पश्चात शव्वाल के छ: रोज़े रखे जायें, ताकि हदीस में जो अज्र व सवाब वर्णित है वह पूर्णतया सिद्ध हो सके।

और इसलिए कि जिस व्यक्ति पर रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा अनिवार्य है उसके बारे में कहा जायेगा कि : उसने रमज़ान के कुछ दिनों का रोज़ा रखा, यह नहीं कहा जायेगा कि उसने रमज़ान का रोज़ा रखा। लेकिन यदि इंसान के साथ कोई उज़्र (बहाना, कारण) पेश आ जाये जो उसे क़ज़ा करने के कारण शव्वाल के महीने में शव्वाल के छ: रोज़े रखने से रोक दे, जैसे कि कोई महिला प्रसव स्थिति वाली हो और वह पूरे शव्वाल, रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा ही करती रह जाये, तो वह शव्वाल के छ: रोज़े ज़ुल-क़ादा के महीने में रख सकती है, क्योंकि वह मा’ज़ूर (उज़्र व बहाना वाली) है। इसी प्रकार हर वह मनुष्य जिसके पास कोई उज़्र (कारण) हो तो उसके लिए रमज़ान के रोज़ों की कज़ा करने के बाद ज़ुल-क़ादा के महीने में शव्वाल के छ: रोज़ों की क़ज़ा करना धर्म संगत है। किन्तु जो व्यक्ति बिना किसी कारण के शव्वाल के महीने को उसका रोज़ा रखे हुए बिना निकाल दे तो उसे यह अज्र व सवाब प्राप्त नहीं होगा।

तथा शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह से प्रश्न किया गया कि यदि किसी महिला पर रमज़ान के रोज़ों का क़र्ज़ है तो क्या उसके लिए जाइज़ है कि वह शव्वाल के छ: रोज़ों को क़र्ज़ से पहले रखे या कि क़र्ज़ को शव्वाल के छ: रोज़ों पर प्राथमिकता दे ?

तो उन्हों ने इस प्राकर उत्तर दिया :

"यदि महिला पर रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा अनिवार्य है तो वह शव्वाल के छ: रोज़ों को रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा करने के बाद ही रखेगी, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं : "जिसने रमज़ान का रोज़ा रखा, फिर उसके पश्चात ही शव्वाल के छ: रोज़े रखे।" और जिस पर रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा अनिवार्य है उसने रमज़ान का रोज़ा नहीं रखा है। अत: उसे शव्वाल के छ: दिनों के रोज़े का सवाब (पुण्य) प्राप्त नहीं होगा मगर इसके बाद कि वह रमज़ान की कज़ा को संपन्न कर ले। यदि मान लिया जाये कि रमज़ान की क़ज़ा में शव्वाल का पूरा महीना लग गया, उदाहरण के तौर पर कोई महिला प्रसव की स्थिति में हो जाये और वह रमज़ान के एक दिन का भी रोज़ा न रखे, फिर शव्वाल के महीने में रोज़े की क़ज़ा शुरू करे और ज़ुल-क़ादा का महीना दाखिल होने के बाद ही उस से फारिग हो, तो वह छ: दिनों का रोज़ा रख सकती है, और उसे शव्वाल में रोज़ा रखने वाले के समान अज्र व सवाब मिलेगा, क्योंकि यहाँ पर उसका विलंब करना एक ज़रूरत के कारण है और उसके लिए (शव्वाल ही के महीने में छ: रोज़े रखना) दुश्वार था, अत: उसे उसका अज्र प्राप्त होगा।" मजमूउल फतावा 19/20 से समाप्त हुआ।

?क्या शव्वाल के रोज़े प्रति वर्ष रखना ज़रूरी हैं

क्या शव्वाल के रोज़े प्रति वर्ष रखना ज़रूरी हैं ?

एक व्यक्ति शव्वाल के छ: रोज़े रखता है, उसे कोई बीमारी या कोई रूकावट आ गई या सुस्ती और काहिली के कारण वह किसी साल उसका रोज़ा नहीं रखा, तो क्या उस पर कोई गुनाह है ? क्योंकि हम यह बात सुनते हैं कि जो व्यक्ति किसी वर्ष उसका रोज़ा रख लेता है तो उस के ऊपर उसे न छोड़ना अनिवार्य हो जाता है।

ईद के दिन के बाद शव्वाल के महीने में छ: रोज़े़ रखना सुन्नत है, और जिसने एक बार या उस से अधिक बार उसका रोज़ा रख लिया तो उसके ऊपर निरंतर (अर्थात् प्रति वर्ष) उसका रोज़ा रखना अनिवार्य नहीं हो जाता है, और उसका रोज़ा न रखने वाला गुनाहगार नहीं होता है।

और अल्लाह तआला ही तौफीक़ देने वाला (शक्ति का स्रोत) है। तथा अल्लाह तआला हमारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आप की संतान और साथियों पर दया और शांति अवतरित करे।

इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति के फतावा (10/391) से।