الاثنين، 13 سبتمبر 2010

?क्या शव्वाल के रोज़े प्रति वर्ष रखना ज़रूरी हैं

क्या शव्वाल के रोज़े प्रति वर्ष रखना ज़रूरी हैं ?

एक व्यक्ति शव्वाल के छ: रोज़े रखता है, उसे कोई बीमारी या कोई रूकावट आ गई या सुस्ती और काहिली के कारण वह किसी साल उसका रोज़ा नहीं रखा, तो क्या उस पर कोई गुनाह है ? क्योंकि हम यह बात सुनते हैं कि जो व्यक्ति किसी वर्ष उसका रोज़ा रख लेता है तो उस के ऊपर उसे न छोड़ना अनिवार्य हो जाता है।

ईद के दिन के बाद शव्वाल के महीने में छ: रोज़े़ रखना सुन्नत है, और जिसने एक बार या उस से अधिक बार उसका रोज़ा रख लिया तो उसके ऊपर निरंतर (अर्थात् प्रति वर्ष) उसका रोज़ा रखना अनिवार्य नहीं हो जाता है, और उसका रोज़ा न रखने वाला गुनाहगार नहीं होता है।

और अल्लाह तआला ही तौफीक़ देने वाला (शक्ति का स्रोत) है। तथा अल्लाह तआला हमारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आप की संतान और साथियों पर दया और शांति अवतरित करे।

इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति के फतावा (10/391) से।

الأربعاء، 8 سبتمبر 2010

ज़कातुल फित्र निकालने का समय

ज़कातुल फित्र निकालने का समय

प्रश्नः

क्या ज़कातुल फित्र निकालने का समय ईद की नमाज़ के बाद से उस दिन के अंत तक है ?

उत्तरः

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

ज़कातुल फित्र का समय ईद की नमाज़ के बाद से नहीं शुरू होता है, बल्कि वह रमज़ान के अंतिम दिन के सूरज के डूबने से शुरू होता है, और वह शव्वाल के महीने की पहली रात है, और ईद की नमाज़ के साथ समाप्त हो जाता है ; क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे नमाज़ से पहले निकालने का आदेश दिया है। तथा इसलिए भी कि इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस व्यक्ति ने उसे नमाज़ से पहले अदा कर दिया तो वह मक़बूल ज़कात है, और जिस आदमी ने उसे नमाज़ के बाद अदा किया तो वह सामान्य सदक़ों में से एक सदक़ा है।" (अबू दाऊद 2/262- 263, हदीस संख्या : 1609, इब्ने माजा 1/585, हदीस संख्या :1827, दारक़ुतनी 2/138, हाकिम 1/409)

तथा उसे इस से एक या दो दिन पहले भी निकालना जाइज़ है, इसका प्रमाण इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की रिवायत है कि उन्हों ने कहा : "अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने रमज़ान के सदक़तुल फित्र को अनिवार्य किया है . . . ",

और उसके अंत में फरमाया : "और वे लोग (अर्थात् सहाबा किराम) उस से एक या दो दिन पहले दिया करते थे।"

जिस आदमी ने उसे उसके समय से विलंब कर दिया वह दोषी और गुनाहगार है, उसके ऊपर अनिवार्य है कि वह उसे विलंब करने से तौबा करे और उसे गरीबों के लिए निकाले।

और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला (शक्ति का स्रोत) है।

इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति, फत्वा संख्या (2896).

ज़कातुल फित्र की मात्रा

ज़कातुल फित्र की मात्रा

प्रश्नः

ज़कातुल फित्र की मात्रा क्या है ? और वह कब निकाली जायेगी? तथा वह किस को दी जायेगी ? और क्या उसे मस्जिद के इमाम की तरफ से एकत्रित करना फिर उसे उसके हक़दारों पर वितरित करना चाहे कुछ समय के बाद ही क्यों न हो, जाइज़ है ? और क्या यह मुद्रा स्फीति (मुद्रा विस्तार) के अधीन है ? और क्या उसे उदाहरण के तौर पर अफगानिस्तान में जिहाद करने वालों को भेजना या उसे उदाहरण के तौर पर मस्जिद के निर्माण के कोष में देना जाइज़ है ?

उत्तरः

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

ज़कातुल फित्र की मात्रा एक साअ़ खजूर, या जौ, या किशमिश या पनीर, या तआ़म (खादपदार्थ) है और उसके निकालने का समय ईदुल फित्र की रात से ईद की नमाज़ के पहले तक है।

तथा उसे इस से एक या दो दिन पहले निकालना जाइज़ है। उसे उसके निकालने वाले के देश में गरीब मुसलमानों को दिया जायेगा, तथा उसे किसी दूसरे देश के गरीबों को स्थानांतरित करना जाइज़ है जिसके वासी अधिक़ ज़रूरतमंद हों। मस्जिद के इमाम और उसके समान अमानतदार (विश्वसनीय) आदमी के लिए उसे एकत्रित करना फिर उसे गरीबों पर वितरित करना जाइज़ है, इस शर्त के साथ कि वह ईद की नमाज़ से पहले उसके हक़दारों तक पहुँच जाये। तथा उसकी मात्रा मुद्रा स्फीति के अधीन नहीं है, बल्कि शरीअत ने उसकी मात्रा एक साअ़ निर्धारित की है। और जिस आदमी के पास अपने लिए एवं जिसका खर्च उसके ऊपर अनिवार्य है उसके लिए मात्र ईद के दिन का भोजन (आहार) है तो उस से ज़कातुल फित्र समाप्त हो जायेगा। तथा उसे मस्जिद के निर्माण या परोपकारी कार्यों में लगाना जाइज़ नहीं है।

और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला (शक्ति का स्रोत) है।

इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति के फतावा (9/369) से।

सामर्थ्य के बावजूद जक़ातुल फित्र न निकालने का हुक्म

सामर्थ्य के बावजूद जक़ातुल फित्र न निकालने का हुक्म

प्रश्नः

उस आदमी का क्या हुक्म है जिसके पास ज़कातुल फित्र निकालने का सामर्थ्य (ताक़त) है फिर भी वह ज़कात न निकाले?

उत्तरः

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

जिस व्यक्ति ने ज़कातुल फित्र नहीं निकाली है उस पर अनिवार्य है कि वह अल्लाह तआला से तौबा करे और उस से क्षमा याचना करे, क्योंकि वह उसे रोकने के कारण पापी और दोषी है। तथा वह उसे निकाल कर उसके हक़दारों तक पहुँचाये। और ईद की नमाज़ के बाद उसे सामान्य सदक़ों में से एक सदका़ समझा जायेगा।

और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला (शक्ति का स्रोत) है।

इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति।

ज़कातुल फित्र का हुक्म

ज़कातुल फित्र का हुक्म

प्रश्नः

क्या यह हदीस सहीह है कि "रमज़ान का रोज़ा उठाया नहीं जाता यहाँ तक कि ज़कातुल फित्र अदा कर दिया जाये" ?

और यदि मुसलमान रोज़ेदार ज़रूरतमंद है, ज़कात के निसाब का मालिक नहीं है तो क्या उक्त हदीस के सहीह होने के कारण या उसके अलावा अन्य सुन्नत से प्रमाणित सही शरई प्रमाण के कारण उस पर ज़कातुल फित्र का भुगतान करना अनिवार्य है ?

उत्तरः

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

सदक़तुल फित्र हर उस मुसलमान पर अनिवार्य है जिसके ऊपर स्वयं उसका खर्च अनिवार्य है यदि उसके पास ईद के दिन और उसकी रात को उसके भोजन और उसके अधीन लोगों के भोजन से अतिरिक्त एक साअ (गल्ला इत्यादि) बाक़ी बचता है।

इस विषय में असल (मूल प्रमाण) वह हदीस है जो इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से प्रमाणित है कि उन्हों ने फरमाया:

"अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक साअ खजूर, या एक साअ जौ ज़कातुल फित्र, मुसलमानों में से गुलाम और आज़ाद, पुरूष और स्त्री, छोटे और बड़े पर अनिवार्य कर दिया है, और उसे लोगों के नमाज़ के लिए निकलने से पूर्व अदा कर देने का आदेश दिया है।" (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम, और हदीस के शब्द सहीह बुखारी के हैं)

तथा दूसरा प्रमाण अबू सईद खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस है कि उन्हों ने फरमाया:

"जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमारे बीच मौजूद थे तो हम ज़कातुल फित्र एक साअ खाना (खादपदार्थ), या एक साअ खजूर, या एक साअ जौ, या एक साअ किशमिश, या एक साअ पनीर निकालते थे।" (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम)

तथा आदमी के लिए शहर के आहार उदाहरण के तौर पर चावल इत्यादि से एक साअ निकालना काफी है।

यहाँ साअ से अभिप्राय नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का साअ है और वह एक औसत आदमी की दोनों हथेलियों से चार लप होता है।

यदि कोई आदमी ज़कातुल फित्र नहीं निकालता है तो वह दोषी और गुनाहगार है और उसके ऊपर क़ज़ा करना (यानी समय निकल जाने के बाद भी उसे निकालना) अनिवार्य है।

जहाँ तक उस हदीस का संबंध है जिसका आप ने उल्लेख खिया है, तो हमें उसके सही होने का ज्ञान नहीं है।

हम अल्लाह तआला से दुआ मांगते हैं कि वह आप को तौफीक़ प्रदान करे, तथा हमारे और आप के लिए कथन ओर कर्म को सुधार दे। और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला (शक्ति का स्रोत) है।

इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति के फतावा (9/364) से।

الأربعاء، 18 أغسطس 2010

रमज़ान के महीने में फिल्मों, धारावाहिकों और खेल में समय बिताना

रमज़ान के महीने में फिल्मों, धारावाहिकों और खेल में समय बिताना

कुछ रोज़ेदार रमज़ान के दिन का अधिकतर समय वीडियो और टीवी पर फिल्मों और धारावाहिकों (सीरियल) के देखने और कार्ड (ताश, पत्ते) खेलने में गुज़ारते हैं, तो इसका क्या हुक्म है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

रोज़ेदार तथा अन्य मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह सभी समयों में जो कुछ करता और जो कुछ छोड़ता है, उस में अल्लाह सुब्हानहु व तआला से डरता रहे, तथा वह अल्लाह तआला की हराम की हुई (निषेध) चीज़ को देखने से बचे, जैसे कि अश्लील फिल्में जिन में अल्लाह तआला की वर्जित की हुई चीज़ें नग्न और अर्द्ध नग्न छवियां (तस्वीरें), और बुरी और घृणित बातें प्रस्तुत की जाती हैं। इसी प्रकार जो टीवी पर अल्लाह तआला की शरीअत के विरूध छवियां, गाने, संगीत, गाने-बजाने के यन्त्र (वाद्ययन्त्र) और भ्रामक विज्ञापन और भ्रष्ट दावे प्रकाशित किये जाते हैं। इसी तरह प्रत्येक मुसलमान पर, चाहे वह रोज़ेदार हो या कोई अन्य, यह अनिवार्य है कि वह खेल (लह्व व लईब) के यन्त्रों से खेलने, जैसे कार्ड (पत्ते, ताश) इत्यादि खेलने से बचे। क्योंकि इस में बुराई (निषेध चीज़) का देखना और बुराई का करना पाया जाता है, तथा इस में दिल की कठोरता, उसकी बीमारी, उसके अल्लाह की शरीअत का अपमान करने (उसे कमतर समझने) और अल्लाह तआला की अनिवार्य की हुई चीज़ों जैसे जमाअत के साथ नमाज़ से उपेक्षा करने या अन्य कर्तव्यों के छोड़ने और बहुत सी हराम चीज़ों में पड़ने का कारण बनना है। अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है :

"और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बेकार (लग्व) बातों को मोल लेते हैं कि अज्ञानता के साथ लोगों को अल्लाह के मार्ग से बहकायें और उसे हंसी (मज़ाक, उपहास) बनायें, यही वे लोग हैं जिनके लिए अपमानजनक अज़ाब (यातना) है। जब उस के सामने हमारी आयतों का पाठ किया जाता है तो घमण्ड करते हुए इस तरह मुंह फेर लेता है मानो कि उस ने उन्हें सुना ही नहीं गोया कि उस के दोनों कानों में डाट लगे हुए हैं, आप उसे कष्टदायक यातना की सूचना दे दीजिये।" (सूरत लुक़मान : 6 - 7)

तथा अल्लाह तआला सूरत अल-फुरक़ान के अन्दर अपने बन्दों के गुण का उल्लेख करते हुए फरमाता है :

"और जो लोग झूठ (बुरी बात) पर उपस्थित नहीं होते और जब किसी बेकार चीज़ पर उनका गुज़र होता है तो शराफत (सज्जनता) के साथ गुज़र जाते हैं।" (सूरतुल फुरक़ान : 72)

आयत में "अज़्ज़ूर" (अर्थात् झूठ) का शब्द सभी प्रकार की बुराई को सम्मिलित है, और "ला यश्हदूना" का अर्थ उपस्थित नहीं होते (हाज़िर नहीं होते) के है।

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं : "मेरी उम्मत में ऐसे लोग होंगे जो व्यभिचार, रेशम, शराब और गाने बजाने के यन्त्र (वाद्ययन्त्र) को हलाल ठहरा लेंगे।" इस हदीस को इमाम बुखारी ने अपनी सहीह में सुदृढ़ शब्दों के साथ "तालीक़न" रिवायत किया है।

तथा इसलिए भी कि अल्लाह सर्वशक्तिमान ने मुसलमानों पर हराम (निषेध) में पड़ने के साधनों (कारणों) को वर्जित ठहराया है, और इस में कोई सन्देह नहीं कि बुरी फिल्मों और टीवी पर प्रकाशित की जाने वाली बुराईयों को देखना, उन बुराईयों में पड़ने या उन को नकारने में लापरवाही करने या लचीला होने के साधनों (कारणों) में से है। और अल्लाह तआला ही से सहायता मांगी जा सकती है।

फतावा शैख इब्ने बाज़ रहिमहुल्लाह 4/158.

الأربعاء، 28 يوليو 2010

शाबान के दूसरे अर्द्ध में रोज़ा रखने से निषेध

शाबान के दूसरे अर्द्ध में रोज़ा रखने से निषे

क्या आधे शाबान (यानी 15 शाबान) के बाद रोज़ा रखना जाइज़ है ? क्योंकि मैं ने सुना है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आधे शाबान के बाद रोज़ा रखने से मना किया है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

अबू दाऊद (हदीस संख्या : 3237) तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 738) और इब्ने माजा (हदीस संख्या : 1651) ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जब आधा शाबान हो जाये तो रोज़ा न रखो।" इसे अल्बानी ने सहीह तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 590) में सहीह कहा है।

यह हदीस इस बात को इंगित करती है कि आधे शाबान के बाद अर्थात् सोलहवीं शाबान की शुरूआत से रोज़ा रखना निषिद्ध है।

किन्तु इसके विपरीत ऐसे प्रमाण भी आये हैं जो रोज़ा रखने के जाइज़ होने पर तर्क हैं। उन्हीं में से कुछ निम्नलिखित हैं :

बुख़ारी (हदीस संख्या : 1914) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1156) ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "रमज़ान से एक या दो दिन पहले रोज़ा न रखो, सिवाय उस आदमी के जो - इन दिनों में - कोई रोज़ा रखता था तो उसे चाहिए कि वह रोज़ा रखे।"

इस हदीस से पता चलता है कि आधे शाबान के बाद उस आदमी के लिये रोज़ा रखना जाइज़ है जिसकी रोज़ा रखने की आदत है। जैसेकि किसी आदमी की सोमवार और जुमेरात को रोज़ा रखने की आदत है, या वह एक दिन रोज़ा रखता और एक दिन इफ्तार करता (रोज़ा तोड़ देता) है . . . इत्यादि।

तथा बुखारी (हदीस संख्या : 1970) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1156) ने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पूरे शाबान का रोज़ा रखते थे, आप कुछ दिनों को छोड़कर पूरे शाबान का रोज़ा रखते थे।" हदीस के शब्द मुस्लिम के हैं।

इमाम नववी रहिमहुल्लाह कहते हैं : आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा के कथन ("अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पूरे शाबान का रोज़ा रखते थे, आप कुछ दिनों को छोड़कर पूरे शाबान का रोज़ा रखते थे।") में दूसरा वाक्य, पहले वाक्य की व्याख्या है, और उनके कथन "पूरे शाबान" की व्याख्या "अक्सर शाबान" है।

यह हदीस आधे शाबान के बाद रोज़ा रखने के जाइज़ होने पर दलालत करती है, लेकिन उस आदमी के लिये जो उसे आधे शाबान से पहले से मिलाये।

शाफेईया ने इन सभी हदीसों पर अमल किया है। चुनांचि उनका कहना है कि आधे शाबान के बाद केवल उस आदमी के लिये रोज़ा रखना जाइज़ है जिसकी रोज़ा रखने की आदत है, या वह उसे आधे शाबान से पहले के साथ मिलाये (अर्थात् यदि आधे शाबान से पहले भी वह रोज़ा रखता था तो वह अब उसके बाद भी रोज़ा रख सकता है।)

और यही बात अक्सर विद्वानों के निकट सबसे शुद्ध है कि हदीस में निषेध कराहत (अप्रियता दर्शाने) के लिये नहीं है, बल्कि तहरीम (निषेध और वर्जन दर्शाने) के लिये है।" देखिये : अल-मजमूअ (6/ 399-400) फत्हुल बारी ( 4/ 129)

नववी रहिमहुल्लाह रियाज़ुस्सालिहीन (पृ. 412) में फरमाते हैं : (आधे शाबान के बाद रमज़ान से पहले रोज़ा रखने से निषेध का अध्याय, सिवाय उस आदमी के जो उसे उसके पहले से मिलाये या -उन दिनों में रोज़ा रखना- उसकी किसी आदत के अनुकूल हो जाये जैसेकि सोमवार और जुमेरात को रोज़ा रखने की उसकी आदत हो।)

विद्वानों की बहुमत इस बात की ओर गई है कि आधे शाबान के बाद रोज़ा रखने से नषेध की बात ज़ईफ (कमज़ोर) है। और इस आधार पर उन्हों ने कहा है कि आधे शाबान के बाद रोज़ा रखना मक्रूह (घृणित और नापसन्दीदा) है।

हाफिज़ इब्ने हजर कहते हैं : जमहूर उलमा (विद्वानों की बहुमत) का कथन है कि : आधे शाबान के बाद नफ्ली रोज़ा रखना जाइज़ है और इन लोगों ने इस बारे में वर्णित हदीस को ज़ईफ (कमज़ोर) कहा है। इमाम अहमद और इब्ने मईन ने कहा है कि यह हदीस "मुनकर" है।" (फत्हुल बारी से समाप्त हुआ)।

इसी तरह बैहक़ी और तह़ावी ने भी इसे ज़ईफ कहा है।

तथा इब्ने क़ुदामा ने अपनी किताब "अल-मुग़नी" में उल्लेख किया है कि इमाम अहमद ने इस हदीस के बारे में फरमाया : "यह "महफूज़" - सुरक्षित - नहीं है, और हम ने इसके बारे में अब्दुर्रहमान महदी से पूछा, तो उन्हों ने इसे सहीह (शुद्ध) नहीं कहा, और न ही उन्हों ने इस हदीस को मुझ से वर्णन किया। और वह इस हदीस से उपेक्षा करते थे। अहमद ने कहा : अला सिक़ा (विश्वस्त और भरोसेमंद) आदमी हैं उनकी हदीसों में केवल यही हदीस मुनकर (आपत्तिजनक) है।"

अला से मुराद अला बिन अब्दुर्रहमान हैं, वह इस हदीस को अपने बाप के माध्यम से अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं।

इब्नुल क़ैयिम रहिमहुल्लाह ने "तहज़ीबुस्सुनन" में इस हदीस को ज़ईफ क़रार देने वालों का जवाब दिया है : उन्हों ने जो कुछ कहा है उसका सारांश यह है कि : यह हदीस मुस्लिम की शर्त पर सहीह है, और अला का इस हदीस को अकेले ही रिवायत करना हदीस के अन्दर किसी त्रुटि का कारण नहीं है। क्योंकि अला सिक़ा रावी हैं (हदीस बयान करने वाले को रावी कहते हैं)। और मुस्लिम ने अपनी सहीह के अन्दर उनकी उनके बाप के माध्यम से अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से कई हदीसें रिवायत की हैं। तथा बहुत सारी सुन्नतें ऐसी हैं जिन्हें सिक़ा रावियों ने अकेले ही रिवायत किया है और उम्मत ने उन्हें क़बूल किया है . . . फिर उन्हों ने फरमाया : यह गुमान करना कि यह हदीस शाबान के रोज़े पर दलालत करने वाली हदीसों से टकराती है, तो वास्तव में दोनों के बीच कोई टकराव नहीं है, और वे हदीसें आधे शाबान के बाद उसके पहले आधे के साथ रोज़ा रखने पर दलालत करती हैं, तथा दूसरे आधे में आदत के अनुसार रोज़ा रखने पर दलालत करती हैं। और अला की हदीस आधे शाबान के बाद, बिना किसी आदत के या उसके पहले आघे के साथ मिलाये बिना, रोज़ा रखने की निषिद्धता पर दलालत करती है।" (इब्नुल क़ैयिम की बात समाप्त हुई)

शैख इब्ने बाज़ रहिमहुल्लाह से आधे शाबान के बाद रोज़ा रखने की निषिद्धता की हदीस के बारे में प्रश्न किया गया तो उन्हों ने कहा : वह हदीस सहीह है जैसाकि हमारे भाई अल्लामा शैख नासिरूद्दीन अल्बानी ने कहा है। और उस से मुराद आधे शबान के बाद रोज़े की शुरूआत करने से रोका गया है, किन्तु जिस आदमी ने इस महीने के अक्सर दिनों का रोज़ा रखा या पूरे महीने का रोज़ा रखा तो वह सुन्नत को पहुँच गया।" (मजमूओ फतावा शैख इब्ने बाज़ 15/ 385)

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने "रियाज़ुस्सालिहीन की व्याख्या" (3 / 394) में फरमाया :

"यहाँ तक कि यदि वह हदीस सही ही हो, तब भी उसमें निषेध, हराम होने को नहीं दर्शाता है, बल्कि वह केवल कराहत के लि है, जैसाकि कुछ उलमा रहिमहुमुल्लाह ने इस दृष्टिकोण को अपनाया है। किन्तु जिस आदमी की रोज़ा रखने की आदत है, तो वह आधे शाबान के बाद भी रोज़ा रख सकता है।" (शैख इब्ने उसैमीन की बात समाप्त हुई)

जवाब का सारांश यह है कि :

शाबान के दूसरे आधे में रोज़े का निषेध या तो कराहत (नापसन्दीदा और घृणित होने) के तौर पर है, या उसके वर्जित और हराम होने के कारण है। किन्तु वह आदमी जिसकी -आधे शाबान के बाद- रोज़ा रखने की आदत है, या वह उसे आधे शाबान से पहले के साथ मिलाता है तो उसके लिए कोई निषेध नहीं है।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

इस निषेध की हिमकत (तत्वदर्शिता) यह है कि लगातार रोज़ा रखना आदमी को रमज़ान के रोज़े रखने से कमज़ोर कर सकता है।

यदि आपत्ति व्यक्त की जाये कि : अगर वह महीने के शुरू से ही रोज़ा रखता है, तो यह तो और अधिक कमज़ोरी का कारण है !

ते इसका उत्तर यह है कि जो आदमी शाबान के शुरू से ही रोज़ा रखता है, वह रोज़ा रखने का आदी हो जाता है। अत: उस से रोज़े की कठिनाई समाप्त हो जाती है।

अल्लामा मुल्ला अली क़ारी कहते हैं : यह निषेध तंज़ीह (नापसन्दीदा होने को दर्शाने) के लिये है, इस उम्मत पर दया करते हुए कि कहीं वे रमज़ान के रोज़े के हक़ को स्फूर्ति के साथ अदा करने से कमज़ोर न हो जायें। परन्तु जो आदमी पूरे शाबान का रोज़ा रखता है वह रोज़े का आदी हो जाता है, और उस से कठिनाई दूर हो जाती है। (क़ारी की बात समाप्त हुई)

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।